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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

काली का कल्लू



काली ऐ काली चिल्लाते बच्चे पीछे दौड रहे थे और काली इतराती, बलखाती, उछलती कभी दोनों पैर से खडे होकर बच्चो को डराती इधर से उधर दौङ रही थी. हा कलकत्ता की एक तंग बस्ती मे रहने वाले उस्मान भाई की बकरी का नाम काली ही था . दस दिन पहले ही उस्मान भाई बाजार से इसे खरीद कर लाये थे. बकरी का रंग , बाल, आँखे और सींग इतने खूबसूरत थे कि बरबस ही लोग उसे देखने लगते और दुलारने लगते.

धीरे धीरे काली पूरी बस्ती की चहेती बकरी बन गई. हर कोई उसे काली कह कर आवाज़ देता और वह दौड़ी चली आती. काली रोज अज़ान के समय मस्जिद के पास पहुँच जाती सारी बस्ती के लोग उसे नमाज़ी समझते और कुछ खाने को देते रहते. खाने के लालच मे ये काली सारा समय मस्जिद के आस पास ही बिताती थी.

एक साल बाद काली ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया बस्ती के बच्चो ने उसका नाम कल्लू रख दिया. अब बच्चे कल्लू के साथ शरारत करते और दिन भर काली का कल्लू, काली का कल्लू का शोर करते रहते. बच्चा बड़ा हुआ और वह भी समझ गया की मेरा नाम कल्लू और मेरी माँ का नाम काली है. अतः इस संबोधन पर दोनो किसी के भी बुलाने पर दौड़े आते थे. कल्लू भी माँ के साथ मस्जिद जाता और मस्जिद आने जाने वाले हर नमाज़ी से टकराता लोग समझते की वह सलाम कर रहा है. कल्लू खा खा कर खूब तगड़ा हो रहा था और उस्मान भाई काली का दूध पी पी कर उसे ललचाई नज़र से देखते रहते की बकरी ईद पर यह अच्छे पैसे देकर जाएगा.

शाम के समय काली मस्जिद से लौट रही थी. कल्लू मोहल्ले के बच्चो के साथ कही और था. एक ट्र्क अनायास मस्जिद के बाजू से घुसा और काली को रौंदता हुआ चला गया. सामने याक़ूब चाचा जोर से चिल्लाए अरे रोको साले ने काली को मार दिया. आवाज़ सुन सामने खड़े दो चार लोगो ने ट्र्क रोका, न जाने किसने उस्मान भाई को भी खबर कर दी. वह भी दौड़ कर आ गया काली से लिपट कर रोने लगा और ट्र्क ड्राइवर का कॉलर पकड़ कर मार पीट करने लगा. साथ के लोगो ने बीच बचाव किया तथा ट्र्क वालो से 2000/- रु. नगद उस्मान भाई को दिलवाए. रुपए लूँगी मे खोंस उस्मान भाई ने काली को गौर से देखा कुछ साँसे बाकी थी. उसने तुरंत काली को उठाया और कसाई के पास ले गया और 800/- रु. मे काली का सौदा कर दिया. काली की मौत के 2800/- रु. पाकर उस्मान बहुत खुश था उसने बाजार से जलेबी ली और घर की और चल पड़ा.

इधर कल्लू अपनी माँ को न पाकर बेचेन हो गया. किसी के बुलाने पर आता नही कोई कुछ खिलाना चाहे तो ख़ाता नही. बच्चे परेशान हो गए की कल्लू को क्या हो गया. कल्लू कभी मस्जिद, कभी नीम के पेड़ के नीचे कभी उस्मान भाई का आँगन जॅहा काली बैठी होती थी वहा माँ को ढूँढ रहा था. लेकिन उसे माँ नही मिली. उस्मान भाई ने आते ही कुछ जलेबी निकाल कर कल्लू की तरफ़ बड़ाई लेकिन कल्लू ने मुँह घुमा लिया. उस्मान भाई को समझ मे नही आया फिर बोले- साले को मस्जिद मे आज ज़्यादा खाने को मिल गया होगा इसलिए पेट भरा बकरा इतरा रहा है. शाम को उस्मान ने काली के रहने की जगह से टाट पट्टी, रस्सी हटा दी तो कल्लू और बेचेन हो गया की माँ कहा गई. वह आँख मे आँसू लिया भूखा में-में करता बीमार सा पड़ गया. उसे देख उस्मान भाई को ज़्यादा चिंता थी की इसे कुछ हो गया तो बकरी ईद पर जो रुपए मिलने की उम्मीद है उसका क्या होगा.


कल्लू मस्जिद के पास नीम के पेड़ के नीचे बेहाल पडा था तभी कुछ लोग हाथ मे झंडे लिए जय काली- जय काली के नारे लगाते हुए पास से गुजरे. कल्लू ने काली का नाम सुना तो दौड़ पडा और भीड़ मे शामिल हो चलने लगा. काली के भक्तो ने अपनी जमात मे जब एक बकरे को देखा तो सभी आश्चर्य चकित रह गये उन्होने कल्लू को आगे कर जय काली का जय घोष किया और नाचने लगे और कल्लू को लगा की ये लोग मुझे मेरी माँ के पास ले कर जाएँगे तो वह भी खुशी से नाचने लगा. लोगो ने कल्लू के गले मे हार और सर पर गुलाल लगाया और साथ लेकर मंदिर की ओर चल पड़े. कल्लू भी उनके साथ खुशी-खुशी चल रहा था.

इधर उस्मान भाई का परिवार कल्लू को ढूँढ ढूँढ कर परेशान हो रहा था. उस्मान भाई ने बकरी ईद पर कल्लू को बेचकर जोरुपए मिलने के सपने संजोए थे वो बिखरते नज़र आने लगे. उस्मान भाई की पत्नी कल्लू को कोस रही थी नास -पिटा, हराम खोर न जाने कहा गया हमारा त्योहार बिगाड़ गया. काली तो जाते जाते कुछ दे गई थी पर ये मुआ ऐसे ही चला गया.



उधर माँ काली के मंदिर मे हार गुलाल से लदा हुआ काली भक्तो के बीच कल्लू अपनी माँ से मिलने को आतुर था. बार बार में-में चिल्लाकर दो पेरो पर खड़े हो कर खुशी मना रहा था. कालिका मंदिर मे इस अद्भुत द्र्श्य को देखने के लिए हज़ारो की भीड़ खड़ी थी. अनायास ज़ोर-ज़ोर से नगाड़े ,घंटी, घड़ियाल गूंजने लगे जय माँ काली, काली माँ की जय के उद्घोष से आसमान गूँज उठा. और कल्लू जब जब काली का नाम सुनता खुशी से झूमने लगता उसे लगता की अब वह माँ के ज़्यादा करीब है. उसकी आँखो की चमक से, चेहरे की खुशी से अपनी माँ से मिलने की ललक साफ दिखाई दे रही थी.

लोग माँ काली की पूजा कर कल्लू को वध स्थल की ओर ले गये जहा कल्लू के माथे पर तिलक लगा कर पूजा की गई. माँ काली के भक्त झूमने लगे, माँ काली की जय कह कर कल्लू को बलि स्थान की और इशारा किया, कल्लू को लगा की शायद यही माँ होंगी इस विश्वास से कल्लू ने अपना गला वध स्थल से टिका दिया. सारा वातावरण काली माँ की जय, सर्व पाप- हरिणी, कष्ट निवारिणी, सभी जीव पर दया करने वाली माँ तेरी जय हो. हे माँ हमारी बलि क़बूल करो की आवाज़ के साथ कल्लू का सिर धड़ से अलग हो गया.

कल्लू का कटा सिर माँ कालिका के चरणो मे था और कल्लू की आँख एसे लग रही थी मानो अब भी अपनी माँ को खोज रहीथी. काली के भक्त इस बलि से खुश थे, की माँ काली हम पर खुश है. पता नही भक्तो को माँ काली का आशीर्वाद मिला या नही कल्लू को उसकी माँ मिली या नही. कल्लू की बलि काली मंदिर मे होना थी या उसकी कुर्बानी बकरी ईद पर होना थी इसका फेसला आप करना. पर मुझे ज़रूर बताना की मे माँ काली को प्रसन्न करने के लिए क्या करू.................????????


प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

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