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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

नारी ही नारी की दुश्मन


सामने की हवेली मे हलचल थी किसी के रोने की आवाज आ रही थी.आठ दस लोग जमा थे. मैने जिज्ञासा वश पता किया तो मालूम हुआ कि सेठ हीरालाल की बहु नही रही. घरवालों ने बताया कि उसने आत्महत्या कर ली. मुझे यकीन नही हुआ सेठ की बहू मानसी इसी शहर के शिक्षक ज्ञान प्रकाश की छोटी लड़की थी .हम उसे बचपन से जानते थे बेहद खूबसूरत, प्रत्येक काम मे पारंगत,मृदुभाषी मानसी पूरे मोहल्ले की चहेती थी.

सेठ हीरालाल के पुत्र विकास की कॉलेज मे मानसी से मित्रता हुई जो बाद मे प्रेम और शादी मे तबदील हो गई. सेठ हीरालाल के परिवार ने इस शादी का घोर विरोध किया कि एक मामूली शिक्षक की लड़की हमारे परिवार की बहू नही बन सकती. पर पुत्र मोह के कारण सेठ को हार मानना पड़ी व शादी संपन्न हुई.


उसके बाद से मानसी की गरीबी को लेकर उसके खाली हाथ ससुराल मे आने से उस पर फिकरे कसे जाते थे. प्रताड़ित किया जाता था. शायद यही वजह उसकी आत्माहत्या की थी. मानसी के पिता ज्ञानप्रकाश को एक ही शहर मे होने के बावजूद खबर तक नही दी गई. और उसका दाह संस्कार कर दिया गया.ग्यान प्रकाश ने पुलिस थाने से लेकर पुलिस अधीक्षक तक गुहार लगाई लेकिन सेठ हीरालाल के सिक्कों की खन खन मे उनकी आवाज दब गई. और मामला पूरी तरह समाप्त हो गया.

आज देश में हजारों मानसी दहेज और गरीबी का शिकार हो रही हैं. और ये सबसे दुख की बात है कि औरत की दुश्मन औरत ही हैं.जब एक लड़की दुलहन बन ससुराल आती हैं तो उसके मन के कई ख्वाब पल रहे होते हैं. तब समाज और मोहल्ले की औरतें एकजुट हो कर उसके गले का हार, नाक, कान्, के आभूषण, उसकी चूड़ी उसकी पायल देखते हैं.उसके कपड़े कितने भारी है इस पर निगाह होती हैं. इन चीजों मे कमी होने पर उसे पता नही क्या क्या संज्ञाए दी जाती है.

औरत बेटी के लिए चाहती है की वो योग्य हो समझदार हो लेकिन बहु के लिये उसकी सोच विपरीत होती हैं बहू उनसे कम समझदार हो हमेशा उनकी मातहत बनी रहे अक्ल मे उनसे कमजोर रहें माल उनसे ज्यादा लाए. यही महिलाओं की मानसिकता की वजह से औरत औरत की दुश्मन बन जाती है.


यह सच हैं कि आज महिलाएँ देश के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है. किरण बेदी,सानिया मिर्जा, और देश के राष्ट्रपति पद तक पहुँच गई है . लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं और देश कि 70% महिलाएँ आज भी पैरों की ज़ुति है.

भारत गाँवों का देश है और गाँवों मे महिला शिक्षित नही हैं. वे पुरुषों के अधीन है, उनके जुल्म, उन पर हो रही यातना की खबर शहरों तक आ ही नही पाती. वहीं शहरों मे वो तबका जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनकी बेटियाँ भी अपनी मनपसंद जगह शादी नहीं कर पाती क्योकी उनका परिवार सक्षम नहीं होता.

आजादी के 61 सालों बाद भी नारी कि ऐसी स्थिति के लिए हमारा समाज ही जिम्मेदार हैं. नारी ही नारी की दुश्मन बन बैठी है. महिलाएँ ही महिलाओं को समाज मे वो विशेष स्थान दिला सकती हैं जिसकी वो हकदार है. अतः महिलाओं को ही आगे आना होंगा तभी समस्या का समाधान संभव हैं ,अब भी समय है जाग जाएँ और अपना वजूद बनाए रखने को कदम बढ़ाएँ.शायद ये पंक्तियाँ आपका हौसला बढ़ाएँ

"जिस क्षण न रुकती हो नयन सावन झड़ी
उस क्षण हँसी ले लो किसी तसवीर से
जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तो माँग लो ताकत स्वयं जंजीर से"

प्रेषक -
मोनिका दुबे (भट्ट)

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