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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

वास्तविक दान


हाल ही मे जब मे अपने मायके से कोलकाता वापिस आ रही थी तब ट्रेन मे मेरे साथ एक सभ्रान्त परिवार की बुजुर्ग महिला भी सफ़र कर रही थी. अपने पूरे सफ़र के दौरान मेने देखा की वो जब भी कोई नदी या तालाब आता तो सिक्के निकाल कर उसमे डालती थी और एक बार तो उन्होने पूरा १०० रु. का नोट बाहर डाल दिया जब मेने उन्हे हेरानी से देखा तो खिसियानी हँसी हँसते हुए बोली की पर्स मे हाथ डालने पर सबसे पहले १०० का नोट आया सो यही डाल दिया जो जल माता के भाग्य मे हो वही सही.

मे सोच रही थी की अगर उनके हाथ मे ५०० या १००० का नोट आता तो क्या वो भी वो पानी मे डाल देती दान और पुण्य कमाने के नाम पर. और ये जानते हुए भी की पानी मे जाने पर ये किसी के काम नही आ पाएँगे. इसी तरह वो पूरे रास्ते भिखारियो को भी कुछ न कुछ देती रही.

बात केवल उन महिला की नही हे मेने कई इस तरह के लोगो को देखा हे जो नदियो मे मंदिरो मे खूब सारा दान करते हे और समझते हे की एसा करने से उनके सारे पाप धुल जाएँगे. दान करना मे ग़लत नही मानती लेकिन दान सिर्फ़ दिखावे के लिए और फ़िजूल किया जाए ये बात अखरती हे.

आप ये क्यो नही सोचते की इन्ही रुपयो से किसी ग़रीब बच्चे की स्कूल की फिस दी जा सकती हे. या उसे कुछ खिलाया जा सकता हे. किसी ज़रूरतमंद की मदद से बड़ा कोई पुण्य नही हो सकता. कई लोग धार्मिक स्थानो पर लाखो रुपयो का दान करते हे और अपने ही घर काम करने वाली बाई के बच्चो को ज़रा सा कुछ देने मे भी कतराने लगते हे. भगवान के लिए सोने और चाँदी के मुकुट या सिंहासन बनवाए जाते हे और झोपड़ पट्टी के लोगो को देख नाक भौ सिकोड लेते हे. ये केसा दान हे. इसमे किसका भला होगा ये बात मुझे समझ नही आती.

दिखावे मे दिया गया दान दान नही होता दान छुपा कर दिया जाए तो उसका महत्व हे. आजकल धर्म के नाम पर दान आम बात हे. मे इसका विरोध नही करती पर मुझे तरीका ठीक नही लगता. कही ये लाइन पढ़ी थी वही जेहन मे आ रही हे

"तेरा बाजार तो महँगा बहुत हे
लहू फिर क्यो यहा सस्ता बहुत हे
कलम को छोड़ माला हाथ मे ले ले
धर्म के नाम पर धंधा बहुत हे "

कहने का तात्पर्य सिर्फ़ यही की धर्म के नाम पर आप क्या कर रहे हे एक बार सोचे उसके बाद कदम उठाए.

मे तो इतना समझती हू की "घर से मस्जिद हे बहुत दूर चलो यू कर ले किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए" दिखावा कर के मंदिर मे दान करने की बजाए किसी बच्चे को शिक्षा दिलवाए उसके कपड़े बनवाए उसके खाने का प्रबन्ध करे तो शायद सही अर्थो मे भगवान की अर्चना होगी और वो प्रसन्न होंगे. और हमारा इंसानियत का धर्म हम सच्चे अर्थो मे निभा पाएँगे. जो धर्म बाकी सभी धर्मो से उपर हे. बस यही निवेदन हे आप सभी से की एक बार मेरी बात पर विचार ज़रूर कीजिएगा.

प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)





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