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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

नई सीख










शुक्रिया मेरी नई जिंदगी मेरे जीवन मे नए रंग भरने का शुक्रिया. तुम्हारी मासूम किल्कारिया नटखट हँसी चंचल आँखे देख कर मुझे महसूस होता हे की मे अभी तक कितने बड़े सुख से वंचित थी. तुमने आकर वो कमी पूरी की. मेरे अधूरेपन को पूरा किया. और मुझे हर दिन नई सीख भी देते हो.

आज महसूस होता हे की मम्मी पापा ने भी इसी तरह रात रात भर जाग कर अपनी परवाह किए बिना किस तरह से हमे बड़ा किया होगा और हम कितनी आसानी से उनका दिल दुखा देते हे. आज महसूस होता हे की जब मम्मी प्यार से खाना बनाकर खिलाती थी और हम स्कूल या कॉलेज जाने की जल्दी मे बिना खाए ही चल देते थे. छोटी छोटी बात मे उनसे रूठ जाते थे. पापा से अपनी फरमाइश पूरी करने के लिए अड़ जाते थे. और केसे मम्मी पापा भी हमारी हर खुशी हर फरमाइश को पूरा करने की कोशिश करते थे. हमारी खुशी देख कर उनके चेहरे का सुकून आज भी आँखो मे घूमता हे. आज भी मम्मी पापा अपनी बिटिया की खुशी के लिए बेटे की खुशी के लिए हर संभव प्रयास करते हे.

मेरे बेटे तुमने मेरी जिंदगी मे आकर मुझे अहसास दिलाया की औलाद को बड़ा करना कितना मुश्किल हे और जब वही औलाद माता पिता के व्रद्धावस्था मे उन्हे सहारा न दे तो उन्हे कितनी तकलीफ़ होती होगी. मेरे बेटे तुमने मुझे मेरे गुस्से पर काबू रखना धीरज रखना सिखाया. कितनी बार मम्मी से मे गुस्सा होती थी और वो मुझे मनाती रहती थी. कितनी बार मम्मी खाना की प्लेट लगाती और छोटा भाई कुछ फरमाइश करता तो अपना खाना बीच मे छोड़ कर मम्मी उसकी ज़िद पूरी करती. कभी हम बीमार होते तो पूरी रात मम्मी पापा सो नही पाते.

मुझे याद हे अपने बचपन मे एक बार मेने पापा से साइकिल लाने की ज़िद की थी और पूरा दिन कुछ नही खाया था पापा मेरे लिए १५० किलोमीटर दूर से बाइक पर पीछे सवार होकर और हाथ मे छोटी साइकिल लिए घर आए थे पापा के हाथ सूज गये थे इतनी दूर साइकिल उठाने से. लेकिन मे उनकी हाथो की सूजन नही देख पाई बल्कि अपनी साइकिल देख खुशी से झूम उठी और पापा भी अपना दर्द भूल खुशी से मुस्कुराने लगे.

मुझे पहली बार होस्टल के लिए भेजते समय मम्मी पापा की आँखे कितना कुछ कह रही थी. कितनी हिदायते और साथ मे नम आँखे लिए दोनो मुझे स्टेशन छोड़ने आए थे. और हॉस्टल से जब भी घर जाती मम्मी तरह तरह के पकवान बना बना कर खिलाती सारी मेरी पसंद का खाना पूरा दिन मम्मी किचन मे लगी रहती और पापा बाजार से मेरी ज़रूरत की सारी चीज़े लेकर आते. मेरी पहली जॉब की पहली सेलेरी से जब मम्मी के लिए साडी और पापा को शॉल दिया था तो दोनो रोने लगे थे.

शादी के समय भी पापा ने मुझे बहुत प्यारा सा तोहफा एक खत के रूप मे दिया था ( आप उसे मेरे पुराने पोस्ट मे "पापा की सीख" के रूप मे देख सकते हे.http://bhattmonika.blogspot.com/2008/10/blog-post_25.html) जो मेरे लिए बहुत अनमोल हें.

ये सारी बाते आज अपने बेटे को देख आँखो मे घूमती हे. और मे मन ही मन ये सोचती हू की अब कभी मम्मी पापा का दिल किसी बात से नही दुखे ये कोशिश करूँगी. और आप से भी यही अनुरोध करूँगी की मम्मी पापा का दिल नही दुखाना कभी भी.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

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